Friday, 17 May 2013

अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम


खुदाया ये बेखुदी कि खुद के साथ बैठ कर
अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

तमाम चेहरों में कौन सा चेहरा है मेरे दोस्त
है खुद से ये सवाल किया मैनें कई शाम…

इस आग के दरिया की मैं भी तो लहर  हूं
सोचा है साहिल पर खडे  रहके मैनें कई  शाम…

ये कैसी कशमकश है ये कैसा जुनूं है
समझी तो नहीं पर सोचा है यही मैनें कई शाम..

एक चांद को तारों से करते बात देखकर
ढूंढा है अपना भी आसमान कई शाम …..

---आहंग

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