Sunday, 12 May 2013

सच और झूठ के बीच ---- कुछ जगह खाली है ....

नग्न आकाश के नीचे -
मैं कितनी ही देर---
तन के मेह में भीगती रही ,
वह कितनी ही देर
तन के मेह में गलता रहा
फिर बरसों के मोह को --
एक जहर की तरह पी कर
उसने कांपते हाथों से
मेरा हाथ पकडा !
चल ! क्षणों के सिर पर
एक छत डालें
वह देख !
परे --सामने ,उधर
सच और झूठ के बीच ----
कुछ जगह खाली है ....

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