Tuesday, 14 May 2013

अभी न पर्दा गिराओ


एहसास जिसके कितने ही रूप है .....
सच में यह एहसास ही तो है बंद मुठी से शब्दों के जाल में फसे , तो कही खुले आस्मां में एक उची उड़ान भरते हुए ......  


अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे हैं।
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है।



गुलज़ार जी ने कितनी खूबसूरती से एहसास की व्याख्या की है .... कितने ही एहसास हजारो पर्दों के पीछे कही छिपे होते है , कुछ प्रत्यक्ष व् कुछ अप्रत्यक्ष .....


यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगूला बनकर
यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को लेकर
कहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!




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