Friday, 17 May 2013

अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम


खुदाया ये बेखुदी कि खुद के साथ बैठ कर
अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …

तमाम चेहरों में कौन सा चेहरा है मेरे दोस्त
है खुद से ये सवाल किया मैनें कई शाम…

इस आग के दरिया की मैं भी तो लहर  हूं
सोचा है साहिल पर खडे  रहके मैनें कई  शाम…

ये कैसी कशमकश है ये कैसा जुनूं है
समझी तो नहीं पर सोचा है यही मैनें कई शाम..

एक चांद को तारों से करते बात देखकर
ढूंढा है अपना भी आसमान कई शाम …..

---आहंग

Tuesday, 14 May 2013

अभी न पर्दा गिराओ


एहसास जिसके कितने ही रूप है .....
सच में यह एहसास ही तो है बंद मुठी से शब्दों के जाल में फसे , तो कही खुले आस्मां में एक उची उड़ान भरते हुए ......  


अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे हैं।
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है।



गुलज़ार जी ने कितनी खूबसूरती से एहसास की व्याख्या की है .... कितने ही एहसास हजारो पर्दों के पीछे कही छिपे होते है , कुछ प्रत्यक्ष व् कुछ अप्रत्यक्ष .....


यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगूला बनकर
यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को लेकर
कहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!




Monday, 13 May 2013

हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है


हर ख़ुशी में कोई कमी-सी है
हँसती आँखों में भी नमी-सी है

दिन भी चुप चाप सर झुकाये था
रात की नब्ज़ भी थमी-सी है

किसको समझायें किसकी बात नहीं
ज़हन और दिल में फिर ठनी-सी है

ख़्वाब था या ग़ुबार था कोई
गर्द इन पलकों पे जमी-सी है

कह गए हम ये किससे दिल की बात
शहर में एक सनसनी-सी है

हसरतें राख हो गईं लेकिन
आग अब भी कहीं दबी-सी है

Sunday, 12 May 2013

सच और झूठ के बीच ---- कुछ जगह खाली है ....

नग्न आकाश के नीचे -
मैं कितनी ही देर---
तन के मेह में भीगती रही ,
वह कितनी ही देर
तन के मेह में गलता रहा
फिर बरसों के मोह को --
एक जहर की तरह पी कर
उसने कांपते हाथों से
मेरा हाथ पकडा !
चल ! क्षणों के सिर पर
एक छत डालें
वह देख !
परे --सामने ,उधर
सच और झूठ के बीच ----
कुछ जगह खाली है ....

Friday, 10 May 2013

छोटी सी मुलाकात .....!!!



बादल...

सुनो !
क्या देख रहे हो
यूँ हसो न हम पर
जानते हो न ..... फिर भी
बस
यु न सताओ ...
समेट लो हमे अपनी शीतल बूंदों के घेरे में
बर्फ की तरह जिसमें पिघल जाएँ हम
और समां जाएँ तुम्ही में इन बूंदों की तरह .............


Sunday, 5 May 2013


मेरी सेज हाजिर है
पर जूते और कमीज की तरह
तू अपना बदन भी उतार दे
उधर मूढ़े पर रख दे
कोई खास बात नहीं
बस अपने अपने देश का रिवाज है……