खुदाया ये बेखुदी कि खुद के साथ बैठ कर
अपना ही इंतेज़ार किया है मैनें कई शाम …
तमाम चेहरों में कौन सा चेहरा है मेरे दोस्त
है खुद से ये सवाल किया मैनें कई शाम…
इस आग के दरिया की मैं भी तो लहर हूं
सोचा है साहिल पर खडे रहके मैनें कई शाम…
ये कैसी कशमकश है ये कैसा जुनूं है
समझी तो नहीं पर सोचा है यही मैनें कई शाम..
एक चांद को तारों से करते बात देखकर
ढूंढा है अपना भी आसमान कई शाम …..
---आहंग
---आहंग

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